NCERT की नई किताबों में क्या बदला? जानिए नए अध्यायों से लेकर पिछले तीन वर्षों के विवादित बदलावों तक की पूरी कहानी
Authored By: Nishant Singh
Published On: Monday, June 29, 2026
Updated On: Monday, June 29, 2026
NCERT एनसीईआरटी की नई कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान की किताब में आपातकाल, वेद, चुनाव आयोग, एसआईआर और मनुस्मृति जैसे नए विषय शामिल किए गए हैं. इन बदलावों पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है. जानिए इस बार क्या बदला, किन संशोधनों पर विवाद हुआ और पिछले तीन वर्षों में हुए प्रमुख बदलावों की पूरी कहानी.
Authored By: Nishant Singh
Updated On: Monday, June 29, 2026
NCERT राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) एक बार फिर अपनी नई पाठ्यपुस्तकों में किए गए बदलावों को लेकर चर्चा के केंद्र में है. कक्षा 9 की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक में इस बार कई नए विषय जोड़े गए हैं, जिनमें आपातकाल, भारतीय ज्ञान परंपरा, वेद, चुनाव आयोग, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और महिला सशक्तिकरण से जुड़ी सामग्री शामिल है. इसके साथ ही मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख भी किया गया है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलाव विवाद का कारण बने हों. पिछले तीन वर्षों में भी इतिहास, राजनीति, संस्कृति और न्यायपालिका से जुड़े कई संशोधन चर्चा और विरोध का विषय रहे हैं.
इस बार कक्षा 9 की किताब में क्या-क्या नया जोड़ा गया?
2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए जारी सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक में छात्रों को केवल घटनाओं की जानकारी देने तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संस्कृति और संस्थाओं से जुड़े कई नए विषयों को विस्तार से शामिल किया गया है. पुस्तक में आपातकाल पर अलग अध्याय दिया गया है. भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत चारों वेदों का परिचय जोड़ा गया है. चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता सूची, ईवीएम, वीवीपैट और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रियाओं को भी समझाया गया है. इसके अलावा महिला सशक्तिकरण से जुड़े अध्याय में मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख करते हुए महिलाओं के सम्मान की अवधारणा पर चर्चा की गई है.
आपातकाल पर क्या पढ़ाया जाएगा?
नई पुस्तक में वर्ष 1975 से 1977 के बीच लागू आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है. इसमें उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, जन आंदोलनों और राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने की पृष्ठभूमि का उल्लेख किया गया है. साथ ही यह भी बताया गया है कि उस दौरान कई मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और अनेक राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार किया गया. पुस्तक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और 1977 के आम चुनावों का भी उल्लेख है, जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए सत्ता परिवर्तन को लोकतंत्र की मजबूती का उदाहरण बताया गया है. उल्लेखनीय है कि आपातकाल का विषय पहली बार नहीं जोड़ा गया है, बल्कि पहले भी उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रम में इसका अध्ययन कराया जाता रहा है.
वेद, मनुस्मृति और महिला सशक्तिकरण को कैसे जोड़ा गया?
नई पुस्तक में भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का परिचय दिया गया है. इसमें बताया गया है कि वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने, धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने और सार्वजनिक जीवन में योगदान देने का अवसर मिलता था. पुस्तक में अपाला, घोषा, लोपामुद्रा और विश्ववारा जैसी महिला ऋषियों का उल्लेख भी किया गया है. इसके साथ मनुस्मृति के एक प्रसिद्ध श्लोक का संदर्भ दिया गया है, जिसमें महिलाओं के सम्मान की बात कही गई है. हालांकि पुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि समय के साथ सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण महिलाओं की स्थिति में उतार-चढ़ाव आया और कई कालखंडों में उनका सामाजिक स्थान कमजोर भी हुआ.
चुनाव आयोग और SIR को क्यों किया गया शामिल?
नई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में भारतीय चुनाव प्रणाली को विस्तार से समझाया गया है. इसमें चुनाव आयोग की स्वतंत्र भूमिका, मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया, आदर्श आचार संहिता, ईवीएम और वीवीपैट जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है. साथ ही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को भी शामिल किया गया है. पुस्तक के अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव कराना बड़ी जिम्मेदारी है और चुनाव आयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसके जरिए छात्रों को चुनावी प्रक्रिया की बुनियादी समझ देने का प्रयास किया गया है.
इन बदलावों पर किस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं?
नई किताब के प्रकाशित होते ही राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि पाठ्यक्रम में इतिहास और लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है. वहीं चुनाव आयोग और SIR को लेकर भी सवाल उठाए गए. दूसरी ओर केंद्र सरकार की ओर से इन बदलावों का समर्थन किया गया और कहा गया कि छात्रों को देश के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक घटनाक्रमों की जानकारी मिलनी चाहिए. सोशल मीडिया पर भी इन संशोधनों को लेकर समर्थन और विरोध, दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं.
पिछले वर्षों में भी कई बदलाव बने थे विवाद की वजह
एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में बदलावों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. पिछले तीन वर्षों में कई ऐसे संशोधन हुए, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी.
- भारत विभाजन पर विशेष मॉड्यूल: वर्ष 2025 में कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों के लिए भारत विभाजन पर दो विशेष मॉड्यूल जारी किए गए. इनमें विभाजन के कारणों और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया. विपक्षी दलों ने इसे इतिहास की अलग व्याख्या बताते हुए आपत्ति जताई.
- मुगलकाल और मध्यकालीन इतिहास में संशोधन: इतिहास की पुस्तकों में मुगल शासन, दिल्ली सल्तनत और कुछ ऐतिहासिक घटनाओं की प्रस्तुति में बदलाव किए गए. साथ ही यह भी जोड़ा गया कि इतिहास के कठिन अध्यायों को वर्तमान सSet featured imageमय के पूर्वाग्रहों से अलग होकर समझना चाहिए. इन परिवर्तनों पर इतिहासकारों और राजनीतिक दलों के बीच लंबी बहस हुई.
- संवेदनशील राजनीतिक विषय हटाए गए: वर्ष 2024 में राजनीति विज्ञान की पुस्तकों से बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे और अल्पसंख्यकों से जुड़े कुछ विषयों में संशोधन या हटाने का निर्णय लिया गया. इसे लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं.
- मुगल साम्राज्य और शीत युद्ध से जुड़े अध्याय हटे: वर्ष 2023 में कक्षा 10, 11 और 12 की पुस्तकों से मुगल साम्राज्य, अकबरनामा, बादशाहनामा, कोल्ड वॉर, एक-दलीय प्रभुत्व और कुछ अन्य अध्याय हटाए गए. एनसीईआरटी ने इसे नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम को सरल और अद्यतन बनाने की प्रक्रिया बताया था.
अन्य विवाद जिन पर बाद में सफाई देनी पड़ी
हाल के वर्षों में केवल इतिहास ही नहीं बल्कि अन्य विषयों की पुस्तकों को लेकर भी विवाद सामने आए. कन्नड़ भाषा की पुस्तक ‘कृष्णा’ के नाम और उसके भोजन संबंधी अध्याय को लेकर सवाल उठे, जिसके बाद एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि पुस्तक का नाम कृष्णा नदी पर आधारित है और उसमें किसी विशेष खान-पान का समर्थन नहीं किया गया है.
इसी तरह मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा की संपादित तस्वीर प्रकाशित होने पर इतिहासकारों और कलाकारों ने आपत्ति जताई. विवाद बढ़ने के बाद परिषद ने मूल तस्वीर को दोबारा प्रकाशित करने का निर्णय लिया.
इसके अलावा कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े अध्याय पर भी बहस हुई, जिसमें न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों और लंबित मामलों का उल्लेख था. इस विषय पर भी कानूनी और शैक्षणिक स्तर पर चर्चा हुई.
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