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Gandhi Jayanti 2026: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, लेकिन अहंकार आपको बना सकता है विधर्मी
Authored By: स्मिता
Published On: Monday, September 30, 2024
Last Updated On: Wednesday, September 16, 2026
गांधी दर्शन के मूल तत्व जैन धर्म और बौद्ध धर्म में निहित माने जाते थे। ये दोनों धर्म अहिंसा को सर्वोपरि मानते हैं। इसका अर्थ है “मारने या नुकसान पहुंचाने की इच्छा का अभाव”। जैन ग्रंथ के अनुसार, सभी प्राणी जीना चाहते हैं।
Authored By: स्मिता
Last Updated On: Wednesday, September 16, 2026
अहिंसा परमो धर्मः। अहिंसा सर्वोच्च धर्म है। हिंदू धर्म में सभी जीवों के प्रति प्रेम करने के साथ-साथ उसके प्रति किसी भी तरह की हिंसा नहीं करने की सीख दी जाती है। यह कथन अकसर जैन मंदिरों की दीवारों पर खुदा हुआ पाया जाता है। हिंदू धर्म की तरह इसका उद्देश्य हानिकारक कर्मों के संचय को रोकना है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Father of the Nation Mahatma Gandhi) ने अहिंसा के बारे कहा था, ‘अहिंसा सर्वोच्च कर्म है। यह हमारे भीतर आत्मा की शक्ति या ईश्वर की शक्ति है। जो व्यक्ति इसके सार को नहीं समझ पाता है वह अपूर्ण है। वह इसकी ज्वाला को सहन करने में सक्षम नहीं होगा। यदि इसका एक छोटा सा अंश भी हमारे भीतर सक्रिय हो जाता है, तो चमत्कार (Gandhi Jayanti 2026) कर सकता है।”
जीवन जीने का तरीका अहिंसा (Non Violence importance)
अहिंसा संस्कृत क्रिया मूल ‘सं’ से ली गई है, जिसका अर्थ है मारना। हिम्स “मारने की इच्छा” है। उपसर्ग ‘अ’ एक निषेध के रूप में है। इसलिए अ-हिंसा का शाब्दिक अर्थ है “मारने की किसी भी इच्छा का अभाव”। शाब्दिक अनुवाद में अहिंसा का अर्थ ‘बिना किसी नुकसान के रहना है’। पूरी तरह से हानिरहित होना न केवल अपने और दूसरों के लिए, बल्कि सभी जीवित प्राणियों के लिए है। इसके निहितार्थ कहीं अधिक व्यापक हैं। यह हिंसा न करने से कहीं अधिक है। यह किसी व्यक्ति के एक दृष्टिकोण या एक विचार से कहीं अधिक है। यह जीवन जीने का एक संपूर्ण तरीका है। यह हिंसा के विपरीत है। हिंसा का अर्थ है मन, शरीर या वाणी को उत्तेजित करने वाले जुनून के कारण जीवन या प्राण को चोट पहुंचाना।
अहिंसा की अवधारणा
अहिंसा की अवधारणा सभी जीवित प्राणियों तक फैली हुई है। अहिंसा या किसी प्राणी को चोट नहीं पहुंचाने पर पर्यावरण की सुरक्षा, प्राकृतिक आवास और शाकाहारी जीवों की सुरक्षा हो सकती है। बौद्ध धर्म (Buddhism) और जैन धर्म (Jainism) अपने अनुयायियों पर पूर्ण अहिंसा थोपते हैं। हिंदू धर्म (Hinduism) में इसका अर्थ जीवित प्राणियों को चोट न पहुंचाने का सिद्धांत है। हिंदू विशेष रूप से भारत के दक्षिणी भागों में अकसर पशुओं को नुकसान न पहुंचाने की मान्यता के अनुसार मांस खाने से परहेज करते हैं। जो व्यक्ति गीता की भावना को पढ़ता है, उसे अहिंसा भौतिक शरीर के माध्यम से स्वयं को साकार करने का रहस्य सिखाता है।
जैन धर्म में अहिंसा (Non Violence in Jain Dharma)
गांधी दर्शन के मूल तत्व जैन धर्म और बौद्ध धर्म में निहित माने जाते थे। ये दोनों धर्म अहिंसा को सर्वोपरि मानते हैं। इसका अर्थ है “मारने या नुकसान पहुंचाने की इच्छा का अभाव”। जैन ग्रंथ के अनुसार, सभी प्राणी जीना चाहते हैं। उन्हें सुख पसंद है और दर्द से नफरत करते हैं। विनाश से दूर रहकर जीना पसंद करते हैं। वे जीने के लिए तरसते हैं। सभी के लिए जीवन प्रिय है। महावीर ने अहिंसा के सत्य और अनुशासन के साथ आत्मा की चिरस्थायी खोज पर नया प्रकाश डाला। उन्होंने कहा-परमाणु जितना छोटा और सूक्ष्म कुछ भी नहीं है और न ही अंतरिक्ष जितना विशाल कोई तत्व है। जैन धर्म सभी जीवित प्राणियों के प्रति करुणा और दया दिखाना चाहता था।
अहिंसा में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं (Non Violence)
जैन साधुओं के लिए यह स्पष्ट नियम है कि चलते, काम करते, बोलते, भीख मांगते या मलत्याग करते समय हर संभव सावधानी बरती जानी चाहिए, ताकि जीवित प्राणियों को नुकसान न पहुंचे। जैनियों के लिए अहिंसा सर्वोच्च धर्म है। देश या समाज के लिए कार्य करने वाले के लिए बहुत सारी चीज़ें संभव नहीं है।
इसलिए गांधी जी इस तरह से अहिंसा के बारे में बताते हैं कि अहिंसा में अहंकार और गर्व के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए जो व्यक्ति अहिंसक होने का दावा करता है, उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी दिनचर्या में इसका पालन करे। इस संदर्भ में महात्मा गांधी स्वयं कहते हैं: “यदि किसी में अहंकार और गर्व है, तो वह अहिंसक नहीं है। विनम्रता के बिना अहिंसा असंभव है।” इसलिए विनम्र होना सबसे अधिक जरूरी है।
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