मुफ्त की रेवड़ियों का स्वाद हो रहा कड़वा

Authored By: अरुण श्रीवास्तव

Published On: Friday, November 15, 2024

freebies danger for state treasury
freebies danger for state treasury

इन दिनों झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इनमें लोकलुभावन और मुफ्त की योजनाओं पर खूब जोर है। हालांकि यह चलन नया नहीं है। पिछले दिनों इसके चक्कर में हिमाचल प्रदेश सरकार को वेतन देने तक के लाले पड़ गए थे। हालांकि इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस शासित कर्नाटक के संदर्भ में कहा था कि चुनाव के समय मुफ्त के वादे करते समय उन्हें पूरा करने के बारे में भी सोच लेना चाहिए। खड़गे के बयान पर पीएम नरेन्द्र मोदी ने उसी दिन कांग्रेस को घेरा था। दरअसल मुफ्त की रेवड़ियों का स्वाद अंतत: सरकार और देश-प्रदेश की जनता के लिए ही कड़वा होता है...

Authored By: अरुण श्रीवास्तव

Last Updated On: Friday, November 15, 2024

हाइलाइट्स

  • खड़गे ने कर्नाटक के संबंध में कही थी, जिसे वहां के सीएम ने भी परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया कि चुनाव के समय किए गए वादों को पूरा करने में राज्य का खजाना हांफ रहा है।
  • यह पहली बार है कि देश के पीएम और नेता विपक्ष एक ही मुद्दे पर देशव्यापी स्तर पर बात कर रहे थे। होना भी यही चाहिए। मुफ्त वाले वादे आज के जमाने की राजनीति की बड़ी चिंता हैं। रेवड़ी वाली सियासत भी कुछ अधिक हो रही है सो खजाने पर असर स्वाभाविक है।

रेवड़ी…वह मिठाई जो जुबां पर रसीला और मीठा स्वाद घोलती है। थोड़ी चीनी, थोड़े तिल और अलहदा स्वाद, लेकिन फिलहाल रेवड़ी वाली राजनीति कड़वी सी लगने लगी है। बात शुरू हुई थी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (Congress President Mallikarjun Kharge) के बयान से जिसमें उन्होंने कांग्रेस शासित कर्नाटक के संदर्भ में कहा था कि चुनाव के समय मुफ्त के वादे करते समय उन्हें पूरा करने के बारे में सोच लेना चाहिए। बजट होने पर ही इस तरह के वादे जनता से किए जाने चाहिए। खड़गे की इस बात में बहुत दम था। जनता का जीवन सुगम बनाना ही राजनीति का राजधर्म है, लेकिन इसके लिए मुफ्त की सेवाओं के लिए इस तरह के वादे कर देना जिन्हें पूरा करने में राज्य का बजट हांफने लगे, किसी भी तरीके से सही नहीं कहा जा सकता है।

खड़गे ने जो कहा था वह अभूतपूर्व था। किसी राजनीतिक दल जिसने कुछ राज्यों में सरकार बनाने के लिए जमकर चुनावी वादे किए जिनमें मुफ्त बस यात्रा, फ्री पानी, फ्री बिजली जैसी लोकलुभावन घोषणाएं शामिल हों, उस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा यदि सार्वजनिक मंच से यह कहा जाए कि चुनावी वादे करते समय एक बार राज्य के खजाने की सेहत भी देख लें, परख लें कि ये वादे पूरा करना संभव भी होगा या नहीं, अपने आप में एक सुधारात्मक कदम है।

खड़गे ने यह बात जिस कर्नाटक के संबंध में कही थी, अब तो वहां के सीएम ने भी परोक्ष रूप से स्वीकार ही कर लिया है कि चुनाव के समय किए गए वादों को पूरा करने में राज्य का खजाना हांफ रहा है। सिद्धरमैया के गत दिनों दिए गए बयान को सुनें तो यही प्रतिध्वनित होता है। हालांकि उन्होंने यह बात किसी और संदर्भ में कही, लेकिन कही तो है ही। यह अलग बात है कि सिद्धरमैया ने खजाने पर बोझ की बात स्वीकार करते हुए भी यह कहा कि कर्नाटक में उनकी सरकार जनता से किए गए वादे पांच साल जारी रखेगी।

खड़गे के बयान पर पीएम नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) ने उसी दिन कांग्रेस को घेरा था। यह पहली बार था कि देश के पीएम और नेता विपक्ष एक ही मुद्दे पर देशव्यापी स्तर पर बात कर रहे थे। होना भी यही चाहिए। मुफ्त वाले वादे आज के जमाने की राजनीति की बड़ी चिंता हैं। सियासत में जनता को मुफ्त में सुविधाएं, वस्तुएं देना कोई नई बात नहीं है। दक्षिण के राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु तो इस पालिटिकल माडल पर खूब और काफी पहले से ही चलता रहा है। डीएमके (DMK) हो या एआईएडीएमके (AIADMK)…जनता को चुनाव के समय फ्री चावल से लेकर टीवी तक दिए जाते रहे हैं। हां, अन्य राज्यों में इस तरह की सियासत की एंट्री बीते कुछ वर्षों में तेजी से हुई है। खासकर, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस तरह की राजनीति को तेजी दी जिसके बाद अब यह एक परंपरा के रूप में सामने आ रही है।

कर्नाटक के अलावा कांग्रेस ने मुफ्त के वादों वाली सियासत का सफल परीक्षण पंजाब और हिमाचल प्रदेश में भी किया। तमाम कयासों के विपरीत पार्टी ने दोनों ही राज्यों में सत्ता पाई। मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने फिर यही फार्मूला अपनाया लेकिन वहां भाजपा (BJP) ने भी लाड़ली बहना जैसी योजना को पहले से ही लागू कर रखा था और इसके अलावा कुछ अन्य वादे भी किए। नतीजा, पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कमाल का प्रदर्शन किया।

छत्तीसगढ़ के सियासी रण में मुफ्त के वादों वाली सियासत गर्म रही। अब झारखंड में और महाराष्ट्र चुनाव में भी यही देखने को मिल रहा है। जाहिर है कि यह चलन में है, लेकिन इन वादों को पूरा करने में राज्य सरकारों को एक बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है जो राज्य के खजाने का एक अहम हिस्सा होती है। लोगों को सुविधाएं मिलें, विकास हो, जीवन सुगम हो, लेकिन यह केवल हर महीने मिलने वाली नकद राशि से हो, सस्ते सिलेंडर से हो या मुफ्त यात्रा से हो तो शायद विकसित समाज की अवधारणा कहीं पीछे रह जाती है।

जब खड़गे ने कहा था कि पार्टी चुनाव में वही वादे करे जिनके लिए बजट की व्यवस्था हो तो इसके पीछे कहीं न कहीं पहले की चुनावी जीतों के बाद किए गए वादों को पूरा करने में हो रही कठिनाई रही होगी। कहा जाता है कि अधिक मिठाई में कीड़े पड़ते हैं। रेवड़ी वाली सियासत भी कुछ अधिक हो रही है सो खजाने पर असर स्वाभाविक है। इस पर निश्चित ही विचार की जरूरत है।

अरुण श्रीवास्तव पिछले करीब 34 वर्ष से हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में सक्रिय हैं। लगभग 20 वर्ष तक देश के नंबर वन हिंदी समाचार पत्र दैनिक जागरण में फीचर संपादक के पद पर कार्य करने का अनुभव। इस दौरान जागरण के फीचर को जीवंत (Live) बनाने में प्रमुख योगदान दिया। दैनिक जागरण में करीब 15 वर्ष तक अनवरत करियर काउंसलर का कॉलम प्रकाशित। इसके तहत 30,000 से अधिक युवाओं को मार्गदर्शन। दैनिक जागरण से पहले सिविल सर्विसेज क्रॉनिकल (हिंदी), चाणक्य सिविल सर्विसेज टुडे और कॉम्पिटिशन सक्सेस रिव्यू के संपादक रहे। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, करियर, मोटिवेशनल विषयों पर लेखन में रुचि। 1000 से अधिक आलेख प्रकाशित।
Leave A Comment

अन्य खबरें

अन्य खबरें