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यूपी में कांग्रेस का नया दलित दांव, क्या राजेंद्र पाल गौतम बदल पाएंगे 2027 की सियासी तस्वीर?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Thursday, July 2, 2026
Last Updated On: Thursday, July 2, 2026
Congress's new Dalit move in UP: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने दलित वोट बैंक को साधने के लिए राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी बनाया है. पार्टी को उम्मीद है कि यह नया दांव पुराने जनाधार को लौटाने में मदद करेगा, लेकिन मायावती, चंद्रशेखर आजाद और बीजेपी की चुनौती आसान नहीं होगी.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Thursday, July 2, 2026
Congress’s new Dalit move in UP: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक दांव चला है. पार्टी ने वरिष्ठ नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का नया प्रभारी नियुक्त किया है. दलित समुदाय से आने वाले गौतम को जिम्मेदारी देकर कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रही है. लंबे समय से सत्ता से बाहर चल रही पार्टी अब सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधने में जुटी है और उसे उम्मीद है कि यह फैसला संगठन और चुनावी रणनीति दोनों को मजबूती देगा.
क्यों अहम है राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति?
राजेंद्र पाल गौतम का राजनीतिक सफर काफी अलग रहा है. वह पहले बहुजन राजनीति से जुड़े, बाद में आम आदमी पार्टी में शामिल हुए और दिल्ली सरकार में मंत्री भी रहे. अब कांग्रेस में उन्हें अनुसूचित जाति एवं जनजाति विभाग की जिम्मेदारी के बाद उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है. सामाजिक न्याय और दलित मुद्दों पर उनकी सक्रिय छवि को देखते हुए पार्टी मानती है कि वह दलित समाज के बीच कांग्रेस की पकड़ मजबूत कर सकते हैं.
कैसे दूर हुआ कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक?
आजादी के बाद कई दशकों तक उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय कांग्रेस का मजबूत समर्थक माना जाता था. लेकिन कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी के उभार ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए. दलित समाज बड़ी संख्या में बसपा के साथ जुड़ गया और कांग्रेस धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में कमजोर होती चली गई. मायावती के नेतृत्व में बसपा ने इसी सामाजिक आधार पर कई बार सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस लगातार अपना जनाधार खोती गई.
तीसरी बार दलित चेहरे पर भरोसा
यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने दलित नेतृत्व के जरिए उत्तर प्रदेश में वापसी की कोशिश की हो. इससे पहले पार्टी सुशील कुमार शिंदे को प्रदेश प्रभारी बना चुकी है, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली. इसके बाद प्रियंका गांधी के नेतृत्व में बृजलाल खाबरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन संगठन और चुनावी प्रदर्शन में बड़ा बदलाव नहीं दिखा. अब राजेंद्र पाल गौतम के रूप में कांग्रेस तीसरा बड़ा दलित प्रयोग कर रही है और उम्मीद कर रही है कि यह रणनीति पहले से अलग परिणाम देगी.
आसान नहीं होगी सियासी राह
राजेंद्र पाल गौतम के सामने चुनौती केवल संगठन को मजबूत करने की नहीं, बल्कि दलित वोटों को कांग्रेस की ओर आकर्षित करने की भी है. उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति पर आज भी मायावती का प्रभाव बना हुआ है, जबकि चंद्रशेखर आजाद भी तेजी से अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रहे हैं. दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने भी गैर-जाटव दलित वर्ग में अपनी अच्छी पकड़ बनाई है. ऐसे में कांग्रेस के लिए नई जगह बनाना आसान नहीं माना जा रहा.
2027 से पहले सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता करीब 22 प्रतिशत माने जाते हैं, इसलिए हर दल की नजर इस वर्ग पर रहती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि बसपा की कमजोर होती स्थिति और बदलते राजनीतिक माहौल का फायदा उसे मिल सकता है. हालांकि अंतिम फैसला जनता करेगी. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजेंद्र पाल गौतम कांग्रेस को उसका पुराना सामाजिक आधार वापस दिला पाएंगे या यह भी पार्टी का एक और अधूरा राजनीतिक प्रयोग साबित होगा. इसका जवाब 2027 के विधानसभा चुनाव में ही मिलेगा.
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