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छुक-छुक से हाइड्रोजन तक, 173 साल में भारतीय रेलवे ने कैसे बदली देश की तस्वीर?
Authored By: Nishant Singh
Published On: Friday, July 17, 2026
Last Updated On: Friday, July 17, 2026
Steam Engines to Hydrogen Train: भाप के इंजन से शुरू हुआ भारतीय रेलवे का सफर अब हाइड्रोजन ट्रेन तक पहुंच गया है. 173 वर्षों में रेलवे ने डीजल, इलेक्ट्रिक और आधुनिक तकनीकों के जरिए बड़ा बदलाव देखा. अब देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और भविष्य की रेल तकनीक की नई शुरुआत का प्रतीक बनेगी.
Authored By: Nishant Singh
Last Updated On: Friday, July 17, 2026
Steam Engines to Hydrogen Train: भारतीय रेलवे का इतिहास देश की प्रगति का इतिहास भी है. 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे तक 34 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली पहली यात्री ट्रेन ने भारत में रेल युग की शुरुआत की. इस ट्रेन में 14 डिब्बे थे और करीब 400 यात्रियों ने सफर किया था. इसे ‘साहिब’, ‘सिंध’ और ‘सुल्तान’ नाम के तीन भाप इंजनों ने खींचा था. उस समय यह तकनीकी उपलब्धि किसी बड़ी क्रांति से कम नहीं थी. धीरे-धीरे देशभर में रेलवे लाइनें बिछीं और भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शामिल हो गया. आज रेलवे हर दिन करोड़ों यात्रियों और लाखों टन माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाकर देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ बना हुआ है.
भाप से डीजल और फिर बिजली तक बदली तकनीक
शुरुआती वर्षों में भारतीय रेलवे पूरी तरह भाप इंजनों पर निर्भर था. इन इंजनों में कोयला जलाकर भाप तैयार की जाती थी, जिससे ट्रेन चलती थी. हालांकि समय के साथ इनकी सीमाएं सामने आने लगीं. इनमें ईंधन ज्यादा लगता था, धुआं भी अधिक निकलता था और रखरखाव का खर्च भी काफी था. इसके बाद 1960 के दशक में डीजल इंजनों का दौर शुरू हुआ. ये इंजन ज्यादा ताकतवर, तेज और कम रखरखाव वाले साबित हुए. मालगाड़ियों और लंबी दूरी की ट्रेनों के संचालन में इनकी बड़ी भूमिका रही. बाद में भारतीय रेलवे ने इलेक्ट्रिफिकेशन पर जोर दिया. बिजली से चलने वाले इंजन न केवल तेज और ऊर्जा की दृष्टि से बेहतर हैं, बल्कि प्रदूषण भी कम फैलाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर रेल मार्गों का विद्युतीकरण हुआ है और अब देश का अधिकांश ब्रॉड गेज नेटवर्क इलेक्ट्रिक इंजनों से संचालित हो रहा है.
आधुनिक तकनीक ने रेलवे को नई पहचान दी
भारतीय रेलवे अब केवल इंजन बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपनाया गया है. वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी सेमी हाई-स्पीड ट्रेनें, एलएचबी कोच, ऑटोमेटिक सिग्नल सिस्टम, ‘कवच’ सुरक्षा प्रणाली, डिजिटल टिकटिंग और आधुनिक रेलवे स्टेशन इसकी नई पहचान बन चुके हैं. सरकार की बुलेट ट्रेन परियोजना भी भविष्य की बड़ी योजनाओं में शामिल है. इन बदलावों की वजह से यात्रियों को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित, आरामदायक और तेज सफर मिल रहा है. रेलवे लगातार तकनीक के जरिए अपनी सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहा है.
हाइड्रोजन ट्रेन से जुड़ा भारतीय रेलवे का नया अध्याय
अब भारतीय रेलवे पर्यावरण के अनुकूल परिवहन की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरियाणा के जींद स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे. इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जहां हाइड्रोजन ईंधन से ट्रेनें संचालित होती हैं. यह ट्रेन जींद से सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर के रूट पर चलेगी और प्रतिदिन दो राउंड ट्रिप करते हुए कुल 356 किलोमीटर की दूरी तय करेगी. यह जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भांभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खांडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत स्टेशन पर रुकेगी. ट्रेन में हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सिस्टम, आधुनिक सुरक्षा तकनीक और विशेष फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल किया गया है.
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन कहां चलेगी?
भारतीय रेलवे की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा में जींद से सोनीपत के बीच संचालित की जाएगी. यह ट्रेन करीब 89 किलोमीटर लंबे रूट पर चलेगी और प्रतिदिन दो राउंड ट्रिप करते हुए लगभग 356 किलोमीटर की दूरी तय करेगी. यात्रा के दौरान यह जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भांभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खांडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत जैसे स्टेशनों पर रुकेगी. इस ट्रेन में अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली, हाइड्रोजन लीक डिटेक्शन सिस्टम और आधुनिक फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यात्रियों को सुरक्षित और आरामदायक सफर मिलेगा.
कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन?
हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन से बिल्कुल अलग तकनीक पर आधारित है. ट्रेन के आगे और पीछे विशेष पावर कार लगाई गई हैं, जिनमें हाइड्रोजन गैस के टैंक, फ्यूल सेल और बैटरी मौजूद रहती है. जब हाइड्रोजन फ्यूल सेल में पहुंचती है, तो वहां ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रक्रिया के जरिए बिजली तैयार होती है. यही बिजली ट्रेन की मोटर को चलाती है. यदि जरूरत से अधिक बिजली बनती है, तो उसे बैटरी में स्टोर कर लिया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में धुआं नहीं निकलता, बल्कि केवल पानी की भाप बनती है, जिससे यह तकनीक पर्यावरण के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है.
हाइड्रोजन ट्रेन क्यों है खास?
हाइड्रोजन ट्रेन को भविष्य की परिवहन तकनीक माना जा रहा है क्योंकि यह ग्रीन एनर्जी पर आधारित है और इससे लगभग शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है. इससे डीजल की खपत कम होगी और वायु प्रदूषण में भी कमी आएगी. इसकी एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे उन रेल मार्गों पर भी आसानी से चलाया जा सकता है, जहां अभी तक ओवरहेड बिजली लाइनें उपलब्ध नहीं हैं. यह ट्रेन डीजल इंजनों की तुलना में करीब 60 प्रतिशत कम शोर करती है, जिससे सफर अधिक आरामदायक बनता है. इसकी सामान्य परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा होगी, जबकि ट्रायल के दौरान इसने 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल की है. रेलवे के अनुसार यह लगभग एक घंटे में 90 किलोमीटर की दूरी तय करने में सक्षम है. जर्मनी, फ्रांस, जापान और चीन के बाद अब भारत भी हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक अपनाने वाले चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जो भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
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